Thursday, 15 February 2018

खलल....

जी हाँ ,पडती है खलल
जीवन में मेरे जब
  आकर कोई कर जाता
  है सपनों को ध्वस्त मेरे
   देता है झकझोर मेरे
    समूचे अस्तित्व को,
  कितनी आसानी से
  कह जाता है ,
  ये करो ,वो मत करो
   शायद उनकी
  नजरों में
   मेरा न कोई अस्तित्व है
  न व्यक्तित्व
    जब भी बुनना चाहूँ
      सपने ,ठानू उन्हें
     पूरा करनें की
   फिर कोई हाथ
   आकर झकझोर जाता है..
    डाल जाता है
      खलल ....अनचाही ...।

शुभा मेहता ..

 

Tuesday, 6 February 2018

नदी ....

मैं हूँ नदी .....
निकल कर पहाड़ों की गोद से ,
  आ पहुँचती धरा पर
    सबका जीवन
   निर्मल करने
      रवि किरणें जब
      मुझको छूती
     मैं चमक उठती रजत सी
      इठलाती ,बलखाती
    चंचल, चपल
    जीवन देनारी ।
    पर  हे मानव ....
   तू क्यों है
   इतना स्वार्थ मगन
    करता क्यों नहीं मेरा जतन
    उँडेल कर जमाने का करकट
    करता है क्यों मुझको मैला
    कहती हूँ तुझसे
    अब भी संभल जा
     नहीं तो तुझको
    कष्ट पडे़गा सहना
      कहीं ये तेरी करनी
     पड़ जाए तुझे न
    मँहगी ....
    संभल जा अभी भी ...
    ओ मानव संभल जा ....।
    
   शुभा मेहता
   7th Feb .2018

    

Saturday, 27 January 2018

किसान .....

रंग बिरंगे फूल खिले हैं
खेतों और खलिहानों में
आमों पर भी बौर आ गए
  कोयल कूके डालों पर
चारों ओर छाई हरियाली
कोमल कोमल प्यारी प्यारी
दूब लगे कालीन समान
  गेहूँ की बालें लहराएं
   मस्त हवा के झोंके से
    वाह..........
   कितना सुंदर दृश्य मनोरम
    धरती लगती कितनी सुंंदर
   पर वो किसान ..
   जो है हम सबका पालनहार
  करता खून पसीना एक
   खेतों को लहराने मेंं
   अन्न धान उगाने मेंं
  क्यों है उदास ?
क्यों है विवश
कर्ज में डूबा
  अपनें  ही लगाए
  पेडों पर
    लटक जानें को
   आत्मदाह कर जाने को
   छोड़ जाने को
   रोते बिलखते
   बच्चों को ...

  शुभा मेहता
  27 th January ,2018
  
   
  
   
  
 

Thursday, 18 January 2018

बवाल

यहाँ तो हर जगह
मचा है बवाल
  कभी धर्म के नाम पर
कभी संप्रदाय के
  हिंसा ,तोड़फोड़
  धरने , हडतालें
   बस ,बवाल ही बवाल है
   चारो ओर
   जलती हुई बसें
  सिसकते हुए
निर्दोष , मासूम
  आम लोग
   जिन्हें शायद
  इन सब बातों से
  कोई सरोकार नहीं
   फिर भी ,
   खो जाती है
    किसी की माँ
किसी का भाई
  इन बवालियों के
  फसादों में
   आखिर कब तक ?
    कब मिटेगी ये
     दीवारें ...
    कब होगा
लहू का रंग एक ....
  
  
  शुभा मेहता
   18th January ,2018
  

Friday, 12 January 2018

अपना-अपना आकाश...

  सभी को मकर संक्रांति की शुभकामनाएं .......
सभी मित्रों को इस उपलक्ष में चंद पंंक्तियाँ सर्मपित...

सभी को मिले ,
इच्छित आकाश
छू ले ,छू ले
गगन विशाल
भर ले रंग
जीवन में इतने
जितनी पतंग
उडे आकाश
नीली ,पीली
लाल ,गुलाबी
हरी और आसमानी....
रखना माँजा तेज
कोशिश का ...
  दूर गगन तक
   जाना है
    देखो-देखो
   कट ना जाए
    हर मुश्किल से
   बच जाना है
   पतंग अपने
  लक्ष्य की
  सबसे ऊँची
ले जाना है ।

  शुभा मेहता
   12th 2018

Saturday, 30 December 2017

सपना.....

  कल रात सखि ,
   देखा मैंने इक सपना
   कि,इस नए साल में
   सब हिलमिल गए हैं
    झगड़ा ,टंटा कुछ नही
आपस में प्रेम है
न जाति ,न भाषा
की बाधा है कोई
एक स्वर में
गा रहे सब
  हम एक हैं
हम एक हैं ...
  चारों ओर हरियाली है
  बागों में फुलवारी है
  बच्चों की किलकारी है
  बूढों की मुस्कान
  जोश जवानों के
सपनों में
आरक्षण का
नहीं है झंझट
  सबको मिला है
  उसका हिस्सा
  या मजदूर हो
  या हो नेता
  काश............
   न   होता ये इक सपना.......


 
  शुभा मेहता
30th December

 

Tuesday, 14 November 2017

बाल दिवस

  मन करता है
  चलो आज मैं ,
फिर छोटा बच्चा बन जाऊँ
खेलूं कूदूं ,नाचूँ ,गाऊँ
  उछल उछल इतराऊँ
   मन करता है...
   खूब हँसूं मैं
    मुक्त स्वरों मेंं
     धमाचौकड़ी मचाऊँ
     फिर माँ दौड़ीदौडी़ आए
    झूठ मू की डाँट लगाए
    मैं पल्लू उसके छुप जाऊँ
   मन करता है .....
     उछल उछल कर चढूं पेड़ पर
     तोड़ कच्ची इमली खाऊँ
    झूलूं बरगद की शाखा पर
    गिरूं अगर तो झट उठ जाऊँ
     मन करता है.....
   
    शुभा मेहता
     15th Nov ,2017